Friday, December 27, 2019

CAA पर मौलाना मदनी, 'मुसलमानों को लगता है कि प्रदर्शन का ये आख़िरी मौक़ा है'

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबंद में नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हाल ही में हुए जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद के प्रदर्शन की काफ़ी चर्चा हो रही है.

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस विरोध प्रदर्शन के बाद जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद से जुड़े तीन सौ से अधिक लोगों ने अपनी गिरफ़्तारियां दी.

साथ ही इस नए संशोधन अधिनियम को 'काला क़ानून' बताते हुए यह एलान किया कि ये लड़ाई लंबी चलेगी.

जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर एक क़ौम को निशाना बनाने का आरोप लगाया है.

मदनी का कहना है कि नागरिकता संशोधन क़ानून की बात आने पर जब 'घुसपैठिया' शब्द का इस्तेमाल होता है तो उंगलियाँ सिर्फ़ मुसलमानों की तरफ होती हैं, इससे उन्हें शिक़ायत है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलमान इस समय क्या सोच रहे हैं और मदनी के संगठन का इस क़ानून के बारे में क्या कहना है, इस पर बीबीसी संवाददाता शकील अख़्तर ने मौलाना महमूद मदनी से बात की.

बीते एक अरसे से भारतीय मुसलमान ख़ुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है. तमाम मामले हैं जिनकी चर्चा बीते कुछ वर्षों में होती रही है. मुसलमानों को कहीं ना कहीं यह महसूस हो रहा है कि मौजूदा दौर में उसकी कोई आवाज़ नहीं है. अब ये नया क़ानून आ गया जिसे हम काला क़ानून कह रहे हैं. इसके ख़िलाफ़ कितना गुस्सा है यह आप सड़कों पर उतरे लोगों की संख्या से अंदाज़ा लगा सकते हैं.

पर यहाँ एक बात अच्छी तरह समझने की है. वो ये कि कोई भी मुसलमान इस मुल्क़ का किसी ग़ैर-मुसलमान को भारत की नागरिकता दिए जाने के ख़िलाफ़ बिल्कुल नहीं है. समस्या हो रही है हमें बाहर रखे जाने से.

मुझे इस बात को मानने में कोई हर्ज़ नहीं कि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या बांग्लादेश से कोई मुसलमान भारत क्यों आएगा. लेकिन हमारे मुल्क़ ने हमें एक दस्तूर दिया है और उस दस्तूर ने हमें कुछ अधिकार दिए हैं.

आप उस दस्तूर के बुनियादी ढांचे के ख़िलाफ़ जाकर इस क़ानून को ला रहे हैं. फिर इस सरकार में बैठे लोग और उनके समर्थक कह रहे हैं कि ये क़ानून मुसलमान विरोधी नहीं है.

पर जब घुसपैठिया शब्द आता है तो उन सभी की उंगलियाँ मुसलमानों की ओर इशारा करने लगती हैं. तो इस चीज़ ने देश के मुसलमान को परेशान किया है.

क्या लोग नहीं जानते हैं कि इस देश के मुसलमानों ने बड़े सब्र के साथ इससे बड़े-बड़े झटकों को बर्दाश्त किया है.

हदें पार नहीं हुई हैं, पर हम ये कह रहे हैं कि एक लोकतांत्रिक देश में बात कहने का जो हमारा अधिकार है, उसे हमसे ना छीना जाए.

पहली बात ये कि आपने बुनियाद हिला दी है. दूसरी बात ये कि आप लोगों को प्रदर्शन नहीं करने दे रहे हैं. जगह-जगह धारा 144 लगाई जा रही है. कहीं प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जा रही.

जगह-जगह लोगों के साथ बदतमीज़ी की जा रही है. ये लोग नहीं समझ पा रहे हैं कि धरना-प्रदर्शन करने देना, एक अच्छा तरीक़ा होता है असहमति की आवाज़ों को शांत करने का. लोकतंत्र की यही तो ख़ासियत है.

मैं कहूँगा कि आम मुसलमानों का यही अहसास है और ये ग़लत नहीं है. जब आप बोलने का हक़ छीन लेंगे तो फिर रह क्या जाता है.

आपकी पुलिस दमन करेगी, अत्याचार करेगी, लोगों से ज़बरदस्ती करेगी तो याद रखिए लोगों को दबाया नहीं जा सकता. ये और ज़्यादा बढ़ेगा.

जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद मुसलमानों का वो संगठन है जिसने हमेशा 'टू नेशन थ्योरी' का विरोध किया है.

आज़ादी के बाद से ही हमारा इस बात पर ज़ोर रहा है कि 'मुसलमान बनाम अन्य' किसी क़ीमत पर नहीं होना चाहिए, बल्कि हम तो ये कहते आए हैं कि मुल्क़ का भला होगा तभी मुसलमान का भला होगा और मुसलमान का भला होगा, तभी मुल्क़ का भला होगा. ये दोनों एक-दूसरे में बसते हैं.

पर बदकिस्मती ये कि देश में राजनीतिक तौर पर मुसलमानों को हाशिए पर धकेला गया. और अब सामाजिक तौर पर मुसलमानों को पीछे ढकेलने की कोशिश हो रही है.

हमारी बदकिस्मती ये है कि हम इस समुदाय से बात करना चाह रहे हैं, लेकिन एक तरफ कुआँ है और दूसरी तरफ खाई है.

विरोध करने वाले लोगों के साथ खड़े होते हैं तो लोगों को यह समझाना बड़ा मुश्किल है कि हम हिंदू या अन्य किसी को नागरिकता दिए जाने के ख़िलाफ़ नहीं हैं.

इस क़ानून के साथ खड़े होते हैं तो यह नहीं समझ आता कि इस ज़ुल्म को बर्दाश्त कैसे करें. इसलिए हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है.

यह वाक़ई एक बड़ी चुनौती है. लोगों में इसका डर है.

एनआरसी से भी हमारा सैद्धांतिक झगड़ा नहीं है. हम ये नहीं कह रहे कि ये बुरी चीज़ है.

लेकिन मौजूदा सरकार ने इसे लेकर जो इज़हार किया है, जिस अंदाज़ से किया है, उससे लगता है कि उंगली बस मुसलमान की तरफ है, तो यक़ीनन ये हमारे लिए एक चैलेंज है.

Wednesday, December 11, 2019

英国大选2019:生病男孩医院躺地照背后的假消息战

在2019英国大选的最后关头,一张照片将英国全民医疗保健系统(NHS)推上了风口浪尖,也为现任首相约翰逊(Boris Johnson)的竞选之路带来了艰难的一天。

英国媒体近日曝光了一张年幼男孩躺在医院地上的照片。在随后面对记者采访时,首相约翰逊称没有看过这张照片,并拒绝记者在现场用手机向他展示。

利兹总医院(Leeds General Infirmary)向4岁男孩杰克的家人道歉,杰克因疑似肺炎入院后被拍到睡在医院的地板上。

医院的首席医疗官员伊维特·奥德(Yvette Oade)医生说,她对当时没有床位感到“非常抱歉”,因为该院的床位“需求极高”。

英国1948年成立的NHS近年一直面临着资金不足、质量下降的危机。

尽管有这样的声明,社交媒体上还是有很多帖子声称这张照片是伪造的。那么这些说法从何而来呢?BBC事实查核(Reality Check)和国际媒体观察(BBC Monitoring)团队调查了一番。

这张刊登在《约克郡晚报》(Yorkshire Evening Post)和《每日镜报》(Daily Mirror)头版的照片,是杰克的母亲拍的。

她说,杰克一到医院,就被安排了床位和氧气,但几小时后,床位又给了另一位病人。杰克在四个多小时中没有床位。

他的母亲说,她随后用大衣为她的儿子做了一张临时的床,并拍下了照片。

周一,英国独立电视台(ITV)的一名记者试图用手机给约翰逊(Boris Johnson)看这张照片,但约翰逊最初拒绝观看。

这段视频仅在推特上就被播放了数百万次。

在约翰逊拒看照片事件发生后的几个小时内,一篇文章出现在脸书(Facebook)上。发布者声称,自己的“好朋友”是利兹医院的一名资深护士,是男孩的母亲策划了该照片并发送给媒体。这个帖子称,事实上,男孩当时配有一辆医院的儿童推车。

它第一次发布在脸书上的时间是12月9日18点30分。这篇帖子被分享了至少2万次,现已被删除。

BBC《新闻之夜》(Newsnight)采访了这个账号的所有者。她说,实际上他没有好朋友在利兹医院担任资深护士。

这名不愿透露姓名的50多岁的妇女说,她在周一下午接受了一个自称是老校友的人的好友邀请。尽管不认识他,她还是接受了邀请,然后查看了其社交媒体页面。

她看到了关于医院的帖子,就把它复制粘贴到了自己的账户里。她说,自己的帖子突然走红让她怀疑自己是一起协同阴谋的受害者。她现在已注销了她的社交媒体账号。

在几个小时后的周一晚间,在推特(Twitter)上出现了与最初脸书帖子措辞相同的推文。

这些推文被《每日电讯报》(Daily Telegraph)专栏作家艾莉森·皮尔森(Allison Pearson)和保守党政客迈克尔·法布里坎特(Michael Fabricant)等人转发后,获得了更广泛关注