पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबंद में नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हाल ही में हुए जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद के प्रदर्शन की काफ़ी चर्चा हो रही है.
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस विरोध प्रदर्शन के बाद जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद से जुड़े तीन सौ से अधिक लोगों ने अपनी गिरफ़्तारियां दी.
साथ ही इस नए संशोधन अधिनियम को 'काला क़ानून' बताते हुए यह एलान किया कि ये लड़ाई लंबी चलेगी.
जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर एक क़ौम को निशाना बनाने का आरोप लगाया है.
मदनी का कहना है कि नागरिकता संशोधन क़ानून की बात आने पर जब 'घुसपैठिया' शब्द का इस्तेमाल होता है तो उंगलियाँ सिर्फ़ मुसलमानों की तरफ होती हैं, इससे उन्हें शिक़ायत है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलमान इस समय क्या सोच रहे हैं और मदनी के संगठन का इस क़ानून के बारे में क्या कहना है, इस पर बीबीसी संवाददाता शकील अख़्तर ने मौलाना महमूद मदनी से बात की.
बीते एक अरसे से भारतीय मुसलमान ख़ुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है. तमाम मामले हैं जिनकी चर्चा बीते कुछ वर्षों में होती रही है. मुसलमानों को कहीं ना कहीं यह महसूस हो रहा है कि मौजूदा दौर में उसकी कोई आवाज़ नहीं है. अब ये नया क़ानून आ गया जिसे हम काला क़ानून कह रहे हैं. इसके ख़िलाफ़ कितना गुस्सा है यह आप सड़कों पर उतरे लोगों की संख्या से अंदाज़ा लगा सकते हैं.
पर यहाँ एक बात अच्छी तरह समझने की है. वो ये कि कोई भी मुसलमान इस मुल्क़ का किसी ग़ैर-मुसलमान को भारत की नागरिकता दिए जाने के ख़िलाफ़ बिल्कुल नहीं है. समस्या हो रही है हमें बाहर रखे जाने से.
मुझे इस बात को मानने में कोई हर्ज़ नहीं कि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या बांग्लादेश से कोई मुसलमान भारत क्यों आएगा. लेकिन हमारे मुल्क़ ने हमें एक दस्तूर दिया है और उस दस्तूर ने हमें कुछ अधिकार दिए हैं.
आप उस दस्तूर के बुनियादी ढांचे के ख़िलाफ़ जाकर इस क़ानून को ला रहे हैं. फिर इस सरकार में बैठे लोग और उनके समर्थक कह रहे हैं कि ये क़ानून मुसलमान विरोधी नहीं है.
पर जब घुसपैठिया शब्द आता है तो उन सभी की उंगलियाँ मुसलमानों की ओर इशारा करने लगती हैं. तो इस चीज़ ने देश के मुसलमान को परेशान किया है.
क्या लोग नहीं जानते हैं कि इस देश के मुसलमानों ने बड़े सब्र के साथ इससे बड़े-बड़े झटकों को बर्दाश्त किया है.
हदें पार नहीं हुई हैं, पर हम ये कह रहे हैं कि एक लोकतांत्रिक देश में बात कहने का जो हमारा अधिकार है, उसे हमसे ना छीना जाए.
पहली बात ये कि आपने बुनियाद हिला दी है. दूसरी बात ये कि आप लोगों को प्रदर्शन नहीं करने दे रहे हैं. जगह-जगह धारा 144 लगाई जा रही है. कहीं प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जा रही.
जगह-जगह लोगों के साथ बदतमीज़ी की जा रही है. ये लोग नहीं समझ पा रहे हैं कि धरना-प्रदर्शन करने देना, एक अच्छा तरीक़ा होता है असहमति की आवाज़ों को शांत करने का. लोकतंत्र की यही तो ख़ासियत है.
मैं कहूँगा कि आम मुसलमानों का यही अहसास है और ये ग़लत नहीं है. जब आप बोलने का हक़ छीन लेंगे तो फिर रह क्या जाता है.
आपकी पुलिस दमन करेगी, अत्याचार करेगी, लोगों से ज़बरदस्ती करेगी तो याद रखिए लोगों को दबाया नहीं जा सकता. ये और ज़्यादा बढ़ेगा.
जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद मुसलमानों का वो संगठन है जिसने हमेशा 'टू नेशन थ्योरी' का विरोध किया है.
आज़ादी के बाद से ही हमारा इस बात पर ज़ोर रहा है कि 'मुसलमान बनाम अन्य' किसी क़ीमत पर नहीं होना चाहिए, बल्कि हम तो ये कहते आए हैं कि मुल्क़ का भला होगा तभी मुसलमान का भला होगा और मुसलमान का भला होगा, तभी मुल्क़ का भला होगा. ये दोनों एक-दूसरे में बसते हैं.
पर बदकिस्मती ये कि देश में राजनीतिक तौर पर मुसलमानों को हाशिए पर धकेला गया. और अब सामाजिक तौर पर मुसलमानों को पीछे ढकेलने की कोशिश हो रही है.
हमारी बदकिस्मती ये है कि हम इस समुदाय से बात करना चाह रहे हैं, लेकिन एक तरफ कुआँ है और दूसरी तरफ खाई है.
विरोध करने वाले लोगों के साथ खड़े होते हैं तो लोगों को यह समझाना बड़ा मुश्किल है कि हम हिंदू या अन्य किसी को नागरिकता दिए जाने के ख़िलाफ़ नहीं हैं.
इस क़ानून के साथ खड़े होते हैं तो यह नहीं समझ आता कि इस ज़ुल्म को बर्दाश्त कैसे करें. इसलिए हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है.
यह वाक़ई एक बड़ी चुनौती है. लोगों में इसका डर है.
एनआरसी से भी हमारा सैद्धांतिक झगड़ा नहीं है. हम ये नहीं कह रहे कि ये बुरी चीज़ है.
लेकिन मौजूदा सरकार ने इसे लेकर जो इज़हार किया है, जिस अंदाज़ से किया है, उससे लगता है कि उंगली बस मुसलमान की तरफ है, तो यक़ीनन ये हमारे लिए एक चैलेंज है.
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